जिंदगी लगता है जैसे वीरान होनी थी,
मेरी वफ़ा यूँ ही बदनाम होनी थी...
कोई शिकवा नहीं मुझे मेरी बदनामी का,
ये एक दिन यूँ ही सरेआम होनी थी..
वफ़ा के नाम पर मेरी कोशिशे एक दिन,
बेवफा होकर यूँ ही नाकाम होनी थी...
चलते चलते संग क्या पता था क्या होगा,
की मै तनहा और राहें यूँ ही सुनसान होनी थी..
क्या किस्मत की रिश्ते क्या से क्या हो गए,
अब मुलाकात भी बनके अन्जान होनी थी....
अपने तो अपने किस्मत ने भी छोड़ा दिया,
मेरी किस्मत किसी और पे मेहरबान होनी थी...
चन्द कदम दूर मंजिल से वक़्त रूठ गया,
हाथ छूटा जब मुहब्बत जवान होनी थी...
द्वारा लिखित ,
अनुपम "वास्तव"