रविवार, 10 अप्रैल 2011

माँ की भीगी पलकों में........

सबसे अच्छी सबसे सुंदर दुनिया जो चाही मैंने कभी,
स्वर्ग से सुंदर आइ नजर वो माँ की भीगी पलकों में..

मै चला जब सबसे पहले माँ की ऊँगली थाम क़र,
थे खुसी के मोती बिखरे माँ की भीगी पलकों में...

भूख से रोते हुए जब माँ पुकारू मै कभी,
सबकुछ लुटाने की झलक  थी माँ की भीगी पलकों में....

जो गिर पड़ा चलते हुए थे जख्म उभरे पावं पर,
वो दर्द मेरा दिख रहा था माँ की भीगी पलकों में...

था पहला दिन जब स्कूल का मै लिपट रोता रहा,
पर मेरे लिए एक सपना सजा था माँ की भीगी पलकों में....

शाम को जब आता था वापस मिटटी लपेटे तन बदन,
तब गुस्से में भी था प्यार दीखता माँ की भीगी पलकों में....

ये लाइन उस समय के लिए है जब बच्चा पड़ने के लिए बहार जाने वाला होता है और माँ की ये सोच सोच के क्या हालत होती है.........................

ये तो कुछ  पल की थी दुरी पर वो वक़्त भी था आ गया,
 जिसका डर है साफ़ दिखता  माँ की भीगी पलकों में....

जैसे जैसे मै चुन रहा था सामान लेकर जाने को,
वैसे वैसे था एक दर्द बढता माँ की भीगी पलकों में...

जाने की बारी आई जब मेरे पावं थे जड़ हो चले,
तब लाखों समंदर सिमटे देखे माँ की भीगी पलकों में...

न रुक सके आंसू मेरे न दर्द माँ भी छुपा सकी,
ऐसी तड़प ना दिखी कभी थी माँ की भीगी पलकों में...


इसके बावजूद आज कल की माँ के क्या हालात है ये इन पंक्तियों में कहा गया है........
जो  प्यार को लुटाती थी आज प्यार को तरसती है,
हर आंसू खुशी के गम में बदले माँ की भीगी पलकों में.....  

जिसके दर्द को सहती थी ऐसी माँ है अब किस हाल में,
अब दिखता नहीं ये दर्द उसको माँ की भीगी पलकों में.......


वैसे तो कोई भी माँ अपने बच्चे  को श्राप कभी नहीं देती चाहे वो उसके साथ कैसा भी सलूक क्यू न करे, माँ इसीलिए भगवान से भी बड़ी है..... लेकिन उसके एक एक गिरते आंसू ,उसका दर्द खुद ही उस इन्सान को सजा देते है जो उसके लिए जिम्मेदार  है..............ये आखिरी पंक्तियाँ कुछ ऐसा ही बयां कर रही है..

कोशिस करो की गम के आंसू निकले न माँ की आँखों से,
गर ये दुया है तो बद्दुआ  भी है माँ की भीगी पलकों में......

लेखक,
अनुपम"अनमय"

इन्ही वीरान रस्तों पे अकेले फिर से चलना है.....

इन्ही वीरान रस्तों पे अकेले फिर से चलना है,
होके अजनबी खुद से ही खुद को फिर से मिलना है.....

कई है जख्म लेके लौट आये हम ज़माने से,
वक़्त के तार से ये जख्म दिल  का फिर से सिलना है.......

जो खुशिया थी वो दामन से निकल के दूर हो गयी,
गमो के साथ हमको जिंदगी भर फिर से लड़ना है.....

हम भूले थे की  किस्मत में यही वीरान बस्ती है, 
उसी वीरान बस्ती में अकेले फिर से रहना है......

कहू किससे सुनु किससे कोई न रहा गया अपना,
बंद कमरे में खुद की बात खुद ही फिर से कहना है...

हवा के रुख से उल्टा चल के सबकुछ खो दिया मैंने,
हवा के संग संग हमको यहाँ अब फिर से बहना है.....

कोई कितना भी खुश  होले ये सपने सपने होते है,
हकीकत में महल सपनो का एक दिन फिर से ढहना है......


लेखक,
अनुपम"अनमय"