रविवार, 15 मई 2011

क्यू सोचें ?

जिंदगी के कई पहलुयों  से रूबरू करता  ये गीत मैंने लिखा है, कुछ ऐसे सत्य है जिंदगी के जिन्हें इन्सान को न चाहते हुए भी स्वीकार करना पड़ता है, और परिस्थितियों से समझौता कर के आगे बढना पड़ता है, शायद इस  गीत की कोई न कोई पंक्ति आप के जीवन के किसी न किसी पहलु से जुडी होगी और उम्मीद है पसंद आएगी.....

कल की हकीकत हम क्या जाने जो बीत गया उसे क्यू सोचे,
हम आज जो है उसे जीते है  कल क्या हो हम उसे क्यू सोचे......

रोना जो चाहे उसके लिए गम ढेरो है इस दुनिया में,
हम जीने आये है जियेंगे हम रोने की हरदम क्यू सोचे.....

खुद आंसू अपनी आँखों के अपने हाथो से पोछते है,
कोई आये हमे हँसाने को हम आने की उसके क्यू सोचे......

ये टूट गया वो छुट गया क्या हमको मिला क्या दूर गया,
 जो होना है वो होगा ही हम उसपे तड़पने की क्यू सोचे....

हम जीते है हर एक पल को बस अंत समझ  इस जीवन का, 
दो पल की खुशियाँ अच्छी है हम सात जनम की क्यू सोचे.....

हम कश्ती अपनी लेकरके तूफान के बीच में चलते है,
अंजाम की हमको फिकर नहीं हम राह बदलने की क्यू सोचे....

चाहे कितना भी ऊँचा पर्वत हो चाहे कितनी भी मंजिल दूर दिखे,
हम पाने की कोसिस करते है हम खोने की बातें क्यू सोचे......

सर झुकता है ये केवल बस माँ बाप गुरु और रब के लिए,
कही और किसी का झुकता हो हम अपनी झुकाने की क्यू सोचे...

क्या तुमने किया मेरी खातिर क्या मैंने किया तेरी खातिर,
हम देना ही प्यार समझते है हम लेने की बातें क्यू सोचे.......

जब किस्मत ही कुछ ऐसी है सावन भी सुखा बीत गया,
हम पतझड़ में खुस हो लेंगे हम बीते सावन की क्यू सोचे...

हम हँसते है खुस रहते है चाहे कैसी भी दुनिया चल चले,
उन्हें लड़ने की फुर्सत है हमसे हम लड़ने की उनसे क्यू सोचे...

सब करते है बातें औरो की खुद क्या है इनको खबर नहीं,
हम खुद में ही खुस रहते है हम औरो की बातें क्यू सोचे.....

जो चलते है अक्सर भीड़ में वो उस भीड़ में ही खो जातें है,
हम खुद की रह बनाते है हम भीड़ में चलने की क्यू सोचे....


लेखक,
अनुपम"अनमय"