आज कल शाम मे तनहाइयों का जिक्र होता है,
जाम हाथ में लिए परेशानियों का जिक्र होता है...
कोई सुनाता है अपने अपने खुशनुमा लम्हे ,
किसी की बात में दुस्वरियों का जिक्र होता है...
बगल में बैठे दो चार आशिको में यू ही,
अपनी अपनी आशानियों का जिक्र होता है....
अनजाने ही सही उन चुलबुली बातो में ,
जिंदगी की दो चार गहराइयों का जिक्र होता है....
नहीं है होस में कोई दुनिया ये समझ्हती है ,
पर दौरे अ नशा में ही सचाइयों का जिक्र होता है....
कुछा दुख भरे कुछा सुखा भरे अंजाम के साथ ,
भूली बिसरी कई कहानियों का जिक्र होता है....
लड़खड़ाते है कदम महफिल से उठने के बाद,
फिर भी तेज रफ़्तार सवारियों का जिक्र होता है....
दिल से जो न निकले थे दर्दे गम होष में ,
अब मदहोशी में उन रुसवाइयों का जिक्र होता है....
अनुपम "वास्तव"
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