रविवार, 13 फ़रवरी 2011

हमने देखि है यहाँ बदलती हुई हर वक़्त जिंदगी......

हमने देखी यहाँ बदलती हुई हर वक़्त जिंदगी,
घर में कुछ  और बाहर कुछ और जिंदगी....

यूँ तो सिखा है कई तरह से जीवन का फलसफा,
जब देखा तो दिखाती गयी कुछ और जिंदगी....

इन्सान एक से मिले जहा भी  देखा हर तरफ,
पर महल में कुछ और सड़क पे कुछ और जिंदगी..

कहीं उड़ते हुए देखे है हवा में कीमती कागज,
कहीं उसकी कमी ले लेती है कुछ और जिंदगी....

किसी को रंगीनियों से फुर्सत नहीं कुछ और सोचने को,
कही सोती है भूखे पेट यहाँ कुछ और जिंदगी....

यहाँ लगे हैं दौड़ने में सब कहा जाना खबर नहीं,
कुचल के दौड़ते है सब वही कुछ और जिंदगी....

कहीं पे सड़ रही है धुप में बरसात में मेहनत,
कही पे तोड़ती दम भूख से कुछ और जिंदगी..

हजारो बुत बने है हर तरफ इतिहास बनाने को,
लगाकर दाव पे जीती हुई कुछ और जिंदगी.....

तरफ से ,
अनुपम 'वास्तव"





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