अपने सारे दोस्तों के नाम से इस कविता की रचना की है उस समय जब गलगोटिया में हम सब साथ थे, सुरुआती दौर था वो मेरे लिखने का इसलिए कुछ खामिया नजर आ सकती है मगर मैंने इसके बावजूद इसमें कोई बदलाव नहीं किया जैसी लिखा था वैसी ही यहाँ पेश कर रहा हू.....
उम्मीद है मेरे दोस्तों को अच्छी लगेगी....
हम सब अनुपम है इस जग में ईस्वर के रचित है हम सारे,
ये गौरव है हम मिले यहाँ एक दूजे के हम सब प्यारे....
आसमान में सबके प्यारे है रवि सुधाकर दो तारे,
भावना ही एक डोर है जिससे जुड़े प्यार के बंधन सारे,
अमित रहेगी छाप हमारी, ये दुनिया देखेगी सारी,
अभिजीत बनके लहरायेंगे जब आएगी अपनी बारी....
अर्पण कर देना सबकुछ तुम गर दुखी हो अपना यार कोई,
गले लगाना अनुज समझ जब हारे अपना यार कोई......
अभिनव रचना इश्वर की हम, है पंकज सी पहचान लिए,
एक दूजे के आये कम सदा है दिल में ये अरमान लिए....
डरने की कोई बात नहीं हर गुण के है सब इन्द्र यहाँ,
सत्य,तेज,धर्मं और ध्रुव है देवो के देवेन्द्र यहाँ........
अर्जुन से एकाग्र हम ,है लक्ष्य में अपने सब प्रवीण,
हम सब अनूप अपने गुण में हर पल करते है कुछ नवीन .....
है लोकपति श्रीकांत जब महफिल की शोभा बड़ा रहे,
तो स्वर्ग के सारे देव भी अपने गीत विजय के गा रहे....
रंग बिरंगे फूल है हम जिससे है बनी एक सुंदर माला,
खुसबू से हमारी महकेगा, आगे एक एक पल आने वाला....
न भूलेंगे ये गुजरे पल वो हंसी ठिठोली की घड़ियाँ ,
अपने अंदर के भावित भाव से हम जुड़े रहेंगे बन कड़ियाँ....
काटो से भरी हो राह मगर अनिरुध बने तुम चलते रहो,
शारिक होंगे एक दिन हमसब,बस शमा बनके तुम जलते रहो......
द्वारा,
अनुपम'अनमय'