शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

हमको तुम बदनाम ना समझो.............

हम अन्जान दिखते है हमें अन्जान ना समझो,
चुप हैं तो हमको तुम बदनाम ना समझो.......

बड़ी ख़ामोशी से हर एक राह को देखा है,
यू राहों पे भटकता हुआ इन्सान ना समझो......

इस उम्र में ही दुनिया की हकीकत समझ गया हूँ,
कोरे कागज की हमको कोई किताब ना समझो....

खामोश दरिया हूँ तो मत हंसों मेरी ख़ामोशी पर,
कितना राज छुपा है कोई तालाब ना समझो.....

आगाज होगा हमारा भी कभी वक़्त आने पर,
अभी वक़्त ठहरा है इसे अंजाम ना समझो....

जितने आंसू गिरे हमारे वो जाया नहीं होंगे,
इनमे धार है इसे पानी की धार ना समझो....

क्या हुआ जो कुछ पल हम दूर हो गए,
ये इंतिजार है इसको हमारी हार ना समझो....

कदम शेरों के ही हटते हैं पीछे शिकार से पहले,
हम खुद शिकारी है कोई शिकार ना समझो.....

अनुपम "वास्तव"

2 टिप्‍पणियां:

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