कहीं भाई बहन के बीच की तकरार है आंखे,
कहीं रोती रुलाती हैं कहीं हंसती हंसाती हैं,
कहीं रिश्तों की कश्ती की बनी पतवार हैं आंखे.....
कहीं हर प्यार के शुरुआत की आगाज है आंखे,
इश्क खामोश है पर इश्क की आवाज है आंखे,
इश्क करते हैं जो पढ़ते वही इसके इशारों को,
जवां दो धड़कनों के प्यार की हमराज हैं ऑंखें.........
कहीं माँ बाप दोनों की थकी मजबूर हैं आंखे,
जिन्हें आँचल में पाला था उन्ही से दूर हैं आंखे,
रुलाते है उन्हें ही जो कभी हँसना सिखाते थे,
आज बेटों के जीवन की वही नासूर हैं आंखे......
कहीं तो मैकदे के जाम में मदहोश हैं आंखे,
कहीं होता गलत भी देखकर खामोश है आंखे,
कहीं पैसे कहीं ताकत के आगे झुक ये जाती हैं,
यूँ लगता है की जैसे हो चली बेहोश है आंखे........
कहीं हैवानियत से भर गयी हैवान है आंखे,
कहीं पे खून की प्यासी बनी शैतान है आंखे,
कहीं औरों के गम से गमजदा ये होके रोती हैं,
कहीं इन्सान की नियत की खुद पहचान हैं आंखे.........
अनुपम सिंह

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