मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

मैंने एक सपना देखा है एक ऐसा स्कूल बनाने का....

मैंने एक सपना देखा है एक ऐसा स्कूल बनाने का,
बच्चों के नन्हे हाथो से दीवारो को सजाने का....
जहां किताबों का कंधो पे कोई बोझ सताये ना,
हर बच्चे को प्यार मिले और कोई उन्हें रुलाये ना,
खुद ही रचे वो अपने सपने कापी के हर पन्नो पे,
हर कोई समझे उन सपनो को कोई उन्हें मिटाए ना....
स्कूल लगे उनको घर जैसा, घर जैसा सम्मान मिले,
डाट डपट ना मिले उन्हें और ना कोई अपमान मिले,
नन्हे नन्हे पंछी है ये स्कूल ना हो पिजड़ा इनका,
बिना डरे इनको उड़ने का थोड़ा ही सही आसमान मिले....
जहाँ रट-रट कर ना ज्ञान बढ़े ना पैसे से सम्मान बढ़े,
जहाँ करके सीखे हर बच्चा और हर बच्चे का मान बढ़े,
जहाँ खेल खेल में सब जीतें और कोई किसी से हारे ना,
जहाँ बच्चे के सपनो के घर को कोई कभी उजाड़े ना......
जहाँ रंग बिरंगे फूलों सा बचपन भी रंग रंगीला हो,
जहा बचपन का सुर सरगम सा सुन्दर और सुरीला हो,
जहाँ लिखे इबारत नई नई हर बचपन अपने हाथो से,
और उन हाथो से देश हमारा सुन्दर और सजीला हो......

द्वारा लिखित,

    अनुपम सिंह,
      (वास्तव)

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