सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

उम्र के आधे पड़ाव पे ये समझ आया है......

इन्सान जिंदगी में हर एक चीज से कुछ न कुछ सीखता है, कुछ घटनाएँ जो उसके साथ होती है उनसे सीखता है और कुछ औरों के साथ होता हुआ देखकर सीखता है ,शर्त बस एक है की वो सिखाना चाहता हो..देखना और देख कर सीखना दोनों ही बेहद अलग पहलू है. आज  का इन्सान सिर्फ देखता है सीखता नहीं है.. कुछ ऐसे ही मेरी इन पंक्तियों ने कहने की कोशिस की है उम्मीद है ये तो समझ आएगी................

 उम्र के आधे पड़ाव पे ये समझ आया है ,
इन्सान इंसानियत से दूर निकल आया है.......

क्या अपनों की क्या गैरो की हम बात करें, 
वो देर करते नहीं कहने में की ये पराया है....
गर हम झुके तो सर और झुका देते है लोग,
वक़्त ने हमको बड़ी फुरसत से ये दिखाया है....
इतने पथरीले रास्तो से मेरी गुजरी है जिंदगी,
की हर एक ठोकर ने नए इन्सान से मिलाया है...

लुटा दो किसी के वास्ते अगर  अपना सबकुछ,
उसी ने अक्सर ही हमे बड़ी देर तक रुलाया है.....

हमने भी हंस हंस कर हर गम को जगह दी है,
और गम ने भी मेरा साथ ता जिंदगी निभाया है.....

ये दुःख दर्द चलकर क्या पास मेरे आयेंगे,
हमने इनकी बस्ती में ही अपना घर बनाया है........

द्वारा लिखित,
अनुपम"अनमय"
 







शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

कुछ बातें याद रखना.....

 है आखिरी ये शाम तो ये शाम याद रखना,
अपनी यारी की दो चार दिन की याद साथ रखना..

हर लम्हा कोई खुश रहे ये है नहीं मुमकिन,
गम में भी यारो जीने का जज्बात साथ रखना..  

गर मेरी वजह से कभी निकले हो तेरे आंसू तो ,
मेरा तुझसे लिपट के रोने की वो शाम याद रखना...
.
ता जिंदगी यूँ तो साथ निभाना नहीं मुमकिन,
गुजरे हुए लम्हों की बस पहचान साथ रखना,

दूरियां कितनी भी हो हम आजायेंगे तुमसे मिलने,
बस आवाज में बुलाने का वो अंदाज साथ रखना...

भूल जाना मुझको पर एक आरजू है मेरी,
मेरे प्यार का वो पहला पैगाम याद रखना...

थे मिलके जो हासिल किये हमने कई मुकाम,
वो पल सही न सही वो मुकाम याद रखना...
मर के भी हर ख्वाहिस तेरी पूरी किया करेंगे,
हमने जो दी थी तुमको ये जुबान याद रखना.....

द्वारा लिखित,
अनुपम"अनमय"

कुछ बातें अधूरी है.....

कुछ जज्बात अधूरे है कुछ बाते अधूरी है,
बिना उस चाँद के मेरी रातें अधूरी है....

दिल से दिए हो काटें तो फूल से लगते है,
जो दिल से नहीं दिए तो सौगातें अधूरी है..

महबूब अगर  हो तो पतझड़  भी सावन है,
बिना महबूब के सावन की बरसातें  अधूरी है,

ना कहा सको अगर दिल की बात जिससे चाहो,
तो सौ बार मिलके भी वो मुलाकातें  अधूरी है....

द्वारा लिखित,
अनुपम "वास्तव"





बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

मेरी वफ़ा यूँ ही बदनाम होनी थी......

जिंदगी लगता है जैसे वीरान होनी थी,
मेरी वफ़ा यूँ ही बदनाम होनी थी...

कोई शिकवा नहीं मुझे मेरी बदनामी का,
ये एक दिन यूँ ही सरेआम होनी थी..

वफ़ा के नाम पर मेरी कोशिशे एक दिन,
बेवफा होकर यूँ ही नाकाम होनी थी...

चलते चलते संग क्या पता था क्या होगा,
की मै तनहा और राहें यूँ ही सुनसान होनी थी..

क्या किस्मत की रिश्ते क्या से क्या हो गए,
अब मुलाकात भी बनके अन्जान होनी थी....

अपने तो अपने किस्मत ने भी छोड़ा दिया,
मेरी किस्मत किसी और पे मेहरबान होनी थी...

चन्द कदम दूर मंजिल से वक़्त रूठ गया,
हाथ छूटा जब मुहब्बत जवान होनी थी...

द्वारा लिखित ,
अनुपम "वास्तव"

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

हमने देखि है यहाँ बदलती हुई हर वक़्त जिंदगी......

हमने देखी यहाँ बदलती हुई हर वक़्त जिंदगी,
घर में कुछ  और बाहर कुछ और जिंदगी....

यूँ तो सिखा है कई तरह से जीवन का फलसफा,
जब देखा तो दिखाती गयी कुछ और जिंदगी....

इन्सान एक से मिले जहा भी  देखा हर तरफ,
पर महल में कुछ और सड़क पे कुछ और जिंदगी..

कहीं उड़ते हुए देखे है हवा में कीमती कागज,
कहीं उसकी कमी ले लेती है कुछ और जिंदगी....

किसी को रंगीनियों से फुर्सत नहीं कुछ और सोचने को,
कही सोती है भूखे पेट यहाँ कुछ और जिंदगी....

यहाँ लगे हैं दौड़ने में सब कहा जाना खबर नहीं,
कुचल के दौड़ते है सब वही कुछ और जिंदगी....

कहीं पे सड़ रही है धुप में बरसात में मेहनत,
कही पे तोड़ती दम भूख से कुछ और जिंदगी..

हजारो बुत बने है हर तरफ इतिहास बनाने को,
लगाकर दाव पे जीती हुई कुछ और जिंदगी.....

तरफ से ,
अनुपम 'वास्तव"





गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

इशारों ही इशारों में.......

प्यार तो कर लिया हमने इशारो ही इशारो में,
कहा तुमने सुना हमने इशारो ही इशारो में :

खामोश लउब थे अभी तक जो बात कहने में,
हवा ने बात कहा दी वो इशारो ही इशारो में :

नजर के तीर से जालिम की ऐसे हो गए घायल,
की निकला दिल हथेली पे इशारो ही इशारो में:

चन्द कदमो की दुरी पे खड़े थे जाके वो हमसे,
ये धड़कन बढ़ रही थी पर इशारो ही इशारो में:

होठ उनके हिले फिर बात पहुंची दिल में जब मेरे,
तो दिल पागल हुआ मेरा इशारो ही इशारो में :

हम जिस दर्द को होठो से बयां कर नहीं पाए ,
ये लाली आंख की कहा दी इशारो ही इशारो में :

ऐसे खो गए थे हम जरा उनकी निगाहों में ,
ढली ये शाम भी ऐसे इशारो ही इशारो में :

रहेंगे साथ जन्मो तक तेरी बाहों में ऐ हरदम,
ये वादे कर लिए हमने इशारो ही इशारो में:

सुना था जिस नशे की बात हमने इस ज़माने में,
पिला दी वो निगाहों से इशारो ही इशारो में.......

अनुपम "वास्तव"