शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

हमको तुम बदनाम ना समझो.............

हम अन्जान दिखते है हमें अन्जान ना समझो,
चुप हैं तो हमको तुम बदनाम ना समझो.......

बड़ी ख़ामोशी से हर एक राह को देखा है,
यू राहों पे भटकता हुआ इन्सान ना समझो......

इस उम्र में ही दुनिया की हकीकत समझ गया हूँ,
कोरे कागज की हमको कोई किताब ना समझो....

खामोश दरिया हूँ तो मत हंसों मेरी ख़ामोशी पर,
कितना राज छुपा है कोई तालाब ना समझो.....

आगाज होगा हमारा भी कभी वक़्त आने पर,
अभी वक़्त ठहरा है इसे अंजाम ना समझो....

जितने आंसू गिरे हमारे वो जाया नहीं होंगे,
इनमे धार है इसे पानी की धार ना समझो....

क्या हुआ जो कुछ पल हम दूर हो गए,
ये इंतिजार है इसको हमारी हार ना समझो....

कदम शेरों के ही हटते हैं पीछे शिकार से पहले,
हम खुद शिकारी है कोई शिकार ना समझो.....

अनुपम "वास्तव"

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

कैसी कैसी हैं ये आंखे ! Shayari in Hindi !


कहीं माँ की ममता की अलग संसार है आंखे,
कहीं भाई बहन के बीच की तकरार है आंखे,
कहीं रोती रुलाती हैं कहीं हंसती हंसाती हैं,
कहीं रिश्तों की कश्ती की बनी पतवार हैं आंखे.....

कहीं हर प्यार के शुरुआत की आगाज है आंखे,
इश्क खामोश है पर इश्क की आवाज है आंखे,
इश्क करते हैं जो पढ़ते वही इसके इशारों को,
जवां दो धड़कनों के प्यार की हमराज हैं ऑंखें.........

कहीं माँ बाप दोनों की थकी मजबूर हैं आंखे,
जिन्हें आँचल में पाला था उन्ही से दूर हैं आंखे,
रुलाते है उन्हें ही जो कभी हँसना सिखाते थे,
आज बेटों के जीवन की वही नासूर हैं आंखे......

कहीं तो मैकदे के जाम में मदहोश हैं आंखे,
कहीं होता गलत भी देखकर खामोश है आंखे,
कहीं पैसे कहीं ताकत के आगे झुक ये जाती हैं,
यूँ लगता है की जैसे हो चली बेहोश है आंखे........

कहीं हैवानियत से भर गयी हैवान है आंखे,
कहीं पे खून की प्यासी बनी शैतान है आंखे,
कहीं औरों के गम से गमजदा ये होके रोती हैं,
कहीं इन्सान की नियत की खुद पहचान हैं आंखे.........

अनुपम सिंह