सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

उम्र के आधे पड़ाव पे ये समझ आया है......

इन्सान जिंदगी में हर एक चीज से कुछ न कुछ सीखता है, कुछ घटनाएँ जो उसके साथ होती है उनसे सीखता है और कुछ औरों के साथ होता हुआ देखकर सीखता है ,शर्त बस एक है की वो सिखाना चाहता हो..देखना और देख कर सीखना दोनों ही बेहद अलग पहलू है. आज  का इन्सान सिर्फ देखता है सीखता नहीं है.. कुछ ऐसे ही मेरी इन पंक्तियों ने कहने की कोशिस की है उम्मीद है ये तो समझ आएगी................

 उम्र के आधे पड़ाव पे ये समझ आया है ,
इन्सान इंसानियत से दूर निकल आया है.......

क्या अपनों की क्या गैरो की हम बात करें, 
वो देर करते नहीं कहने में की ये पराया है....
गर हम झुके तो सर और झुका देते है लोग,
वक़्त ने हमको बड़ी फुरसत से ये दिखाया है....
इतने पथरीले रास्तो से मेरी गुजरी है जिंदगी,
की हर एक ठोकर ने नए इन्सान से मिलाया है...

लुटा दो किसी के वास्ते अगर  अपना सबकुछ,
उसी ने अक्सर ही हमे बड़ी देर तक रुलाया है.....

हमने भी हंस हंस कर हर गम को जगह दी है,
और गम ने भी मेरा साथ ता जिंदगी निभाया है.....

ये दुःख दर्द चलकर क्या पास मेरे आयेंगे,
हमने इनकी बस्ती में ही अपना घर बनाया है........

द्वारा लिखित,
अनुपम"अनमय"
 







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