रविवार, 10 अप्रैल 2011

इन्ही वीरान रस्तों पे अकेले फिर से चलना है.....

इन्ही वीरान रस्तों पे अकेले फिर से चलना है,
होके अजनबी खुद से ही खुद को फिर से मिलना है.....

कई है जख्म लेके लौट आये हम ज़माने से,
वक़्त के तार से ये जख्म दिल  का फिर से सिलना है.......

जो खुशिया थी वो दामन से निकल के दूर हो गयी,
गमो के साथ हमको जिंदगी भर फिर से लड़ना है.....

हम भूले थे की  किस्मत में यही वीरान बस्ती है, 
उसी वीरान बस्ती में अकेले फिर से रहना है......

कहू किससे सुनु किससे कोई न रहा गया अपना,
बंद कमरे में खुद की बात खुद ही फिर से कहना है...

हवा के रुख से उल्टा चल के सबकुछ खो दिया मैंने,
हवा के संग संग हमको यहाँ अब फिर से बहना है.....

कोई कितना भी खुश  होले ये सपने सपने होते है,
हकीकत में महल सपनो का एक दिन फिर से ढहना है......


लेखक,
अनुपम"अनमय"



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