सोमवार, 26 जुलाई 2010

रहमों करम पाने को तरसती ये निगाहें.....

 माता पिता को अपने बच्चो को पालने में कितनी खुसी होती है  और कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ता 
है और बदले में उन्हें क्या मिलता है अपने बच्चो से ये आजकल किसी से छुपा नहीं है, उन्ही की खुशियों और दर्द को उभारती ये कुछ   पंक्तिया लिखा हु उम्मीद है मेरे दोस्तों को पसंद आएगी......


हर रोज घर की चौखट पे भरती है ये आहें..
रहमो करम पाने को तरसती ये निगाहे ,
.

जिन बुडी आँखों में सपना कोई सजा था,.
उनके सच होने की दुआ  करती ये निगाहे,

अब कदम जो डगमगाते है राह में अक्सर,
मदद की आस में आसुयों में डूब जाती ये निगाहे...


सर उठा के सिखाया था  जिसे राह पे चलना,
सर झुकाया है उसी ने ये दिखाती ये निगाहे...

बहुत देखि है इन आँखों ने ज़माने के रंजो गम,
अब अपनों के दिए गम से थकी दिखती ये निगाहे...

ये अंचल जो निगेहबानी किया करती थी हर पल,
उसी आंचल की लाचारी पे आज रोंती ये निगाहे....

कभी सीने के दूध से जिसने सिंची तेरी जवानी,
अब ठोकर से उसकी दर दर भटकती ये निगाहे....

माँ बाप टूटते नहीं चाहे कितने ही गम दे दुनिया,
आज के घर के चिराग से ही बस डरती ये निगाहे....


द्वारा लिखित,
अनुपम"वास्तव"