रविवार, 15 मई 2011

क्यू सोचें ?

जिंदगी के कई पहलुयों  से रूबरू करता  ये गीत मैंने लिखा है, कुछ ऐसे सत्य है जिंदगी के जिन्हें इन्सान को न चाहते हुए भी स्वीकार करना पड़ता है, और परिस्थितियों से समझौता कर के आगे बढना पड़ता है, शायद इस  गीत की कोई न कोई पंक्ति आप के जीवन के किसी न किसी पहलु से जुडी होगी और उम्मीद है पसंद आएगी.....

कल की हकीकत हम क्या जाने जो बीत गया उसे क्यू सोचे,
हम आज जो है उसे जीते है  कल क्या हो हम उसे क्यू सोचे......

रोना जो चाहे उसके लिए गम ढेरो है इस दुनिया में,
हम जीने आये है जियेंगे हम रोने की हरदम क्यू सोचे.....

खुद आंसू अपनी आँखों के अपने हाथो से पोछते है,
कोई आये हमे हँसाने को हम आने की उसके क्यू सोचे......

ये टूट गया वो छुट गया क्या हमको मिला क्या दूर गया,
 जो होना है वो होगा ही हम उसपे तड़पने की क्यू सोचे....

हम जीते है हर एक पल को बस अंत समझ  इस जीवन का, 
दो पल की खुशियाँ अच्छी है हम सात जनम की क्यू सोचे.....

हम कश्ती अपनी लेकरके तूफान के बीच में चलते है,
अंजाम की हमको फिकर नहीं हम राह बदलने की क्यू सोचे....

चाहे कितना भी ऊँचा पर्वत हो चाहे कितनी भी मंजिल दूर दिखे,
हम पाने की कोसिस करते है हम खोने की बातें क्यू सोचे......

सर झुकता है ये केवल बस माँ बाप गुरु और रब के लिए,
कही और किसी का झुकता हो हम अपनी झुकाने की क्यू सोचे...

क्या तुमने किया मेरी खातिर क्या मैंने किया तेरी खातिर,
हम देना ही प्यार समझते है हम लेने की बातें क्यू सोचे.......

जब किस्मत ही कुछ ऐसी है सावन भी सुखा बीत गया,
हम पतझड़ में खुस हो लेंगे हम बीते सावन की क्यू सोचे...

हम हँसते है खुस रहते है चाहे कैसी भी दुनिया चल चले,
उन्हें लड़ने की फुर्सत है हमसे हम लड़ने की उनसे क्यू सोचे...

सब करते है बातें औरो की खुद क्या है इनको खबर नहीं,
हम खुद में ही खुस रहते है हम औरो की बातें क्यू सोचे.....

जो चलते है अक्सर भीड़ में वो उस भीड़ में ही खो जातें है,
हम खुद की रह बनाते है हम भीड़ में चलने की क्यू सोचे....


लेखक,
अनुपम"अनमय"

   

शुक्रवार, 13 मई 2011

सबने खेला दिल से मेरे एक खिलौने की तरह.....

सबने खेला दिल से मेरे एक खिलौने की तरह,
हर किसी ने आजमाया एक खिलौने की तरह.....

जिसको जब तक प्यार आया साथ में लेकर चला,
फिर किसी कोने में छोड़ा एक खिलौने की तरह.....

जिसको जब हसरत हुई  चाभी भरी मै चल दिया,
और फिर खाया हू ठोकर एक खिलौने की तरह...

जब तलक सबको हंसाया आँख का तारा रहा,
फिर सजाया कांच में एक खिलौने की तरह....

अपने अपने शौक से सबने किये टुकड़े मेरे,
फिर तोड़  कर बिखरा दिया एक खिलौने की तरह....

आँख में आंसू छिपा कर दर्द दिल में रख लिया,
और फिर हँसता रहा हू एक खिलौने की तरह.....

अपनी नहीं कोई खुसी अपना नहीं कोई भी गम,
मै सबकी बस सुनता रहा हू एक खिलौने की तरह.....


लेखक
अनुपम"अनमय"


आंसू है पानी और मोती है पैसा.....

हर रिश्ते पे आज बड़ा भरी है पैसा,
आंसू है पानी और मोती हुआ है पैसा..

मैयत पे आंसू की ना कीमत है तेरे,
जब तक की तेरे हाथो ना गिरता है पैसा...

कोई अपना है या पराया ये पैसा बोलता है,
यहाँ खून के रिस्तो पे भरी हुआ है पैसा.....

अंधे बने रहेंगे किसी बेबस की मौत पर ये,
हुई है जान सस्ती और महंगा हुआ है पैसा...

रातो की नींद पैसा दिल का सुकून पैसा,
आँखों की रौशनी भी सबके हुआ है पैसा...

यहाँ मिलती है सेवा अगर  दिखता है पैसा,
रिश्ता नहीं है कुछ भी सबकुछ हुआ है पैसा...

यहाँ रिस्तो को खिड़की से बाहर यू फेकते है,
घर में जब रिस्तो से प्यारा हुआ है पैसा...

कोई अपना चला जाये आंसू नहीं बहाते,
रोते है सब तब जब जाता है पैसा...

ना बीवी ना बच्चा ना कोई घर है अपना ,
दिन रात सुबह शाम बस साथी हुआ है पैसा......

लेखक,
अनुपम"अनमय"






रविवार, 8 मई 2011

दर्द रोज ही होता है...........

 दर्द रोज ही होता है पर दिखता कभी कभी है,
आंसू छुपाना चाहा पर छुपता कभी कभी है....

कितनी भी करलो कोसिस हर चीज नहीं मिलती,
तुम चाहे जितना मांगो वो मिलता  कभी कभी है.....

हर दर पे गए  रब की शायद वो सुन ले मेरी,
पर अब ये जान पाया की वो सुनता कभी कभी है.....

जिन्हें प्यार है किसी से वो हर रोज ही जलते है,
नफरत जिन्हें है उनका दिल जलता कभी कभी है....

अक्सर ही फूल मिलते है यहाँ प्यार में सभी को,
पर काटें मिले तो कोई चलता कभी कभी है.......

यूं लाखो हसीन चेहरे है दुनिया में देखने को,
पर आँखों में कोई चेहरा बसता कभी कभी है...

इन यारो को क्या बताऊ की दिल पे क्या गुजरी है,
इतने मिले है गम की ये दिल हँसता कभी कभी है......

अक्सर ही फूल पैरो से कुचले हुए देखे है,
अब पन्नो में फूल कोई रखता कभी कभी है.....

आज पल भर किसी का कोई इंतजार नहीं करता,
रस्ते पे अब निगाहे कोई रखता कभी कभी है......


लेखक,
अनुपम"अनमय"





मंगलवार, 3 मई 2011

वक़्त के फैसले पे हर किसी को सर झुकाना है..........

किसी को हंस के पाना है किसी को रोके पाना है,
वक़्त के फैसले पे हर किसी को सर झुकाना  है.....

कोई कितनी भी कोसिस कर ले आने की या जाने की,
न खुद के बस में आना था न खुद के बस में जाना है......

जो खुस हो हम तो रोती है जो रोये तो ये हंसती है,
यही दस्तूर दुनिया का यही इसका फ़साना है..........

हर मोड़  पे लुटते गए किस्मत के हाथो हम,
कभी कोई बहाना था कभी कोई बहाना है..........

यहाँ तकदीर भी कैसे किसे मजबूर करती है,
किसी को रोशनी देने को घर खुद का जलाना है....

मझधार में चलती हुई कश्ती सी है ये जिंदगी,
कभी माझी डुबाता है कभी खुद डूब जाना है..... 
  

लेखक,
अनुपम"अनमय"

आह टूटे दिल की..........

मेरे सपनो को पल भर में न जाने क्यू जला डाला,
समझ  कर बेखबर सबने मेरा ही घर जला डाला...

न जाने क्या बिगाड़ा था यहाँ हमने ज़माने का,
मेरी खुशियों पे ही सबने यहाँ मातम मना डाला.....

कितनी कोसिसे कर ली बया हर दर्द करने की,
सुनी मेरी नहीं अपना ही सबने गम सुना डाला....

कभी गिरते न थे आंसू जहाँ मेरी निगाहों से,
उन्ही आँखों से आंसू खून के सबने बहा डाला....

मेरी आँखों को अश्को से रहे भरते सभी अपने,
जो बरसे हर घडी आँखों को वो सावन बना डाला...

ये परवाना रुका जब न कभी दुनिया के रोके से,
उसी के रंज में सबने शमा को ही बुझा डाला.......


लेखक,
अनुपम"अनमय"

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

सन्नाटों के इस गुलशन में.......

सन्नाटो के इस गुलशन में,
हम रहने को मजबूर हुए,
कुछ ख्वाबों को सच करने को,
इस कंटक पथ के पथिक हुए....

है हममे साहस अनंत अटल,
की पर्वत में भी राह किये,
है जूझ रहे हम हर दुःख से,
साहस का अंनंत प्रवाह लिए...

करना है सबके सपनो को सच,
हों आंसू पर वो खुशी लिए,
हर चेहरा खिले कवल जैसा,
हर दिन आये नवरंग लिए...

है कठिन तपस्या की घड़िया,
असफलताओं का दुह्स्वप्न लिए,
पर संघर्षों की अनन्त कोशिसे,
पतझड़ में आएँगी बसंत लिए.....

लेखक,
अनुपम"अनमय"



और कहीं से तुम आ गये...........

सुना दिल था मेरा और कहीं से तुम आगये,
घर खाली था मेरा और कही से तुम आ गए..

दिल ने आवाज दी दिल को बड़ी खामोसी से,
हमने यद् किया और कही से तुम आ गए.....

हर खुसी मेरी जब मायूस कर चली थी हमें,
ये आंख नम हुई और कही से तुम आ गए....

जान निकले की उससे पहले तुम्हे देखना चाहा,
पलक झपकी ही थी और कही से तुम आ गए....

हर बैठे थे इश्क़ की बाजी जब दुनिया से,
सर झुकाए खड़े थे और कही से तुम आ गए....

हम भटक रहे थे अभी तक अकेले राहों पे,
हमसफ़र माँगा और कही से तुम आ गए...


लेखक,
अनुपम"अनमय" 

तुमसे एक बात कहना चाहता हु............

तुमसे एक बात कहना चाहता हु,
बस एक फरियाद करना चाहता हु,
न कह सके तो मर जायेंगे हम,
इससे पहले मुलाकात करना चाहता हु....

पल भर ही सही आज जी भर लेकिन,
होके अपना सही आज अजनबी लेकिन,
आखिरी बार तेरे साथ होना चाहता हु,
तुमसे एक बात कहना चाहता हु........

किसी के दिल में खुद को कभी बसने न दिया,
रहा तनहा मगर ये दिल कहीं खोने न दिया,
तेरा ये दिल है तुझ्हे आज देना चाहता हु,
तुमसे एक बात कहना चाहता हु.......

खामोश लब थे जब से दूर हो गए थे हम,
जो भी कहते थे सिर्फ तुझसे ही कहते थे हम,
लबों को फिर वही आवाज देना चाहता हु,
तुमसे एक बात कहना चाहता हु.....

कह ले चाहे तू जो भी आज कहना चाहे,
बड़े दिनों के बाद दिल ये आज रोना चाहे,
तेरे पहलु में आखिरी बार रोना चाहता हु,
तुमसे एक बात कहना चाहता हु......

दूर हो कल को हम आज उससे पहले ही,
पहन ले सर पे कफ़न आज उससे पहले ही,
गोद में तेरी एक पल को सोना चाहता हु,
तुमसे एक बात कहना चाहता हु.....

मेरी आँखों ने दिखाए थे कुछ हंसीं सपने,
जो हकीकत न हुए बनके रह गए सपने,
उन्हें आखिरी पल ही सही साथ जीना चाहता हु,
तुमसे एक बात कहना चाहता हु.........

ये आसमान एक था हम ही दूर दूर रहे,
किसी पिजड़े में बंद पंछी से मजबूर रहे,
हर बंधन को आज तोड़ आना चाहता हु,
तुमसे एक बात कहना चाहता हु...

पंख थे, तेरे बगैर मगर उड़ न सके,
आसमा से गिरे पंक्षी की  तरह उड़ न सके,
आज आखिरी बार तेरे साथ उड़ना चाहता हु,
तुमसे एक बात कहना चाहता हु.........


लेखक,
अनुपम"अनमय"



रविवार, 10 अप्रैल 2011

माँ की भीगी पलकों में........

सबसे अच्छी सबसे सुंदर दुनिया जो चाही मैंने कभी,
स्वर्ग से सुंदर आइ नजर वो माँ की भीगी पलकों में..

मै चला जब सबसे पहले माँ की ऊँगली थाम क़र,
थे खुसी के मोती बिखरे माँ की भीगी पलकों में...

भूख से रोते हुए जब माँ पुकारू मै कभी,
सबकुछ लुटाने की झलक  थी माँ की भीगी पलकों में....

जो गिर पड़ा चलते हुए थे जख्म उभरे पावं पर,
वो दर्द मेरा दिख रहा था माँ की भीगी पलकों में...

था पहला दिन जब स्कूल का मै लिपट रोता रहा,
पर मेरे लिए एक सपना सजा था माँ की भीगी पलकों में....

शाम को जब आता था वापस मिटटी लपेटे तन बदन,
तब गुस्से में भी था प्यार दीखता माँ की भीगी पलकों में....

ये लाइन उस समय के लिए है जब बच्चा पड़ने के लिए बहार जाने वाला होता है और माँ की ये सोच सोच के क्या हालत होती है.........................

ये तो कुछ  पल की थी दुरी पर वो वक़्त भी था आ गया,
 जिसका डर है साफ़ दिखता  माँ की भीगी पलकों में....

जैसे जैसे मै चुन रहा था सामान लेकर जाने को,
वैसे वैसे था एक दर्द बढता माँ की भीगी पलकों में...

जाने की बारी आई जब मेरे पावं थे जड़ हो चले,
तब लाखों समंदर सिमटे देखे माँ की भीगी पलकों में...

न रुक सके आंसू मेरे न दर्द माँ भी छुपा सकी,
ऐसी तड़प ना दिखी कभी थी माँ की भीगी पलकों में...


इसके बावजूद आज कल की माँ के क्या हालात है ये इन पंक्तियों में कहा गया है........
जो  प्यार को लुटाती थी आज प्यार को तरसती है,
हर आंसू खुशी के गम में बदले माँ की भीगी पलकों में.....  

जिसके दर्द को सहती थी ऐसी माँ है अब किस हाल में,
अब दिखता नहीं ये दर्द उसको माँ की भीगी पलकों में.......


वैसे तो कोई भी माँ अपने बच्चे  को श्राप कभी नहीं देती चाहे वो उसके साथ कैसा भी सलूक क्यू न करे, माँ इसीलिए भगवान से भी बड़ी है..... लेकिन उसके एक एक गिरते आंसू ,उसका दर्द खुद ही उस इन्सान को सजा देते है जो उसके लिए जिम्मेदार  है..............ये आखिरी पंक्तियाँ कुछ ऐसा ही बयां कर रही है..

कोशिस करो की गम के आंसू निकले न माँ की आँखों से,
गर ये दुया है तो बद्दुआ  भी है माँ की भीगी पलकों में......

लेखक,
अनुपम"अनमय"

इन्ही वीरान रस्तों पे अकेले फिर से चलना है.....

इन्ही वीरान रस्तों पे अकेले फिर से चलना है,
होके अजनबी खुद से ही खुद को फिर से मिलना है.....

कई है जख्म लेके लौट आये हम ज़माने से,
वक़्त के तार से ये जख्म दिल  का फिर से सिलना है.......

जो खुशिया थी वो दामन से निकल के दूर हो गयी,
गमो के साथ हमको जिंदगी भर फिर से लड़ना है.....

हम भूले थे की  किस्मत में यही वीरान बस्ती है, 
उसी वीरान बस्ती में अकेले फिर से रहना है......

कहू किससे सुनु किससे कोई न रहा गया अपना,
बंद कमरे में खुद की बात खुद ही फिर से कहना है...

हवा के रुख से उल्टा चल के सबकुछ खो दिया मैंने,
हवा के संग संग हमको यहाँ अब फिर से बहना है.....

कोई कितना भी खुश  होले ये सपने सपने होते है,
हकीकत में महल सपनो का एक दिन फिर से ढहना है......


लेखक,
अनुपम"अनमय"



रविवार, 3 अप्रैल 2011

फिर से माँ की गोद में सर रख के सोना चाहता हूँ.......

दूर इतना हो गया हूँ  अब पास आना चाहता हूँ ,
गोद  में सर रख के माँ की फिर से सोना चाहता हूँ.....

एक वक़्त था हर दर्द  अपना माँ से कह रोते थे हम  ,
आज फिर हर दर्द माँ से कह के रोना चाहता हूँ....

पेट भर हर चीज खाई फिर भी भूखा रह गया,
अब दूध रोटी माँ के हाथो फिर से खाना चाहता हूँ.....

खो गया हूँ  इस  kadar दुनिया  के इस बाजार में,
अब माँ के आंचल में ही खुद को फिर से खोना चाहता हूँ....  

दूर जाकर पाया सबकुछ पर खोया माँ का प्यार,
माँ की खोई है जो ममता फिर से पाना चाहता हूँ.......

खो दिए जो पल थे सारे बीते माँ की गोद में,
माँ के संग बचपन वही अब फिर से जीना चाहता हूँ......

जिसने मेरी खुशियों के लिए हर दर्द हंस के सह लिया,
अब दर्द माँ का लेके खुसिया फिर से देना चाहता हूँ......


द्वारा लिखित,
अनुपम"अनमय"

रविवार, 27 मार्च 2011

गलगोटिया कॉलेज :- यादों के रंग दोस्तों के संग.......

अपने सारे दोस्तों के नाम से इस कविता की रचना की है उस समय जब गलगोटिया में हम सब साथ थे, सुरुआती दौर था वो मेरे लिखने का इसलिए कुछ खामिया नजर आ सकती है मगर  मैंने इसके बावजूद इसमें कोई बदलाव नहीं किया जैसी लिखा था वैसी ही यहाँ पेश कर रहा हू.....
उम्मीद है मेरे दोस्तों को अच्छी लगेगी....


हम सब अनुपम है इस जग में ईस्वर के रचित है हम सारे,
ये गौरव है हम मिले यहाँ एक दूजे के हम सब प्यारे....

आसमान में सबके प्यारे है रवि सुधाकर दो तारे,
भावना ही एक डोर है जिससे जुड़े प्यार के बंधन सारे,

अमित रहेगी छाप हमारी, ये दुनिया देखेगी सारी,
अभिजीत बनके लहरायेंगे जब आएगी अपनी बारी....

अर्पण कर देना सबकुछ तुम गर दुखी हो अपना यार कोई,
गले लगाना अनुज समझ  जब हारे अपना यार कोई......

अभिनव रचना इश्वर की हम, है पंकज सी पहचान लिए,
एक दूजे के आये कम सदा है दिल में ये अरमान लिए....

डरने की कोई बात नहीं हर गुण के है सब इन्द्र यहाँ,
सत्य,तेज,धर्मं और ध्रुव है देवो के देवेन्द्र यहाँ........

अर्जुन से एकाग्र हम ,है लक्ष्य में अपने सब  प्रवीण,
हम सब अनूप अपने गुण में हर पल करते है कुछ  नवीन ..... 

है लोकपति श्रीकांत जब महफिल की शोभा बड़ा रहे,
तो स्वर्ग के सारे देव भी अपने गीत विजय के गा रहे....

रंग बिरंगे फूल है हम जिससे है बनी एक सुंदर माला,
खुसबू से हमारी महकेगा, आगे एक एक पल आने वाला....

न भूलेंगे ये गुजरे पल वो हंसी ठिठोली की घड़ियाँ ,
अपने अंदर के भावित भाव से हम जुड़े रहेंगे बन कड़ियाँ....

काटो से भरी हो राह मगर अनिरुध बने तुम चलते  रहो,
शारिक होंगे एक दिन हमसब,बस शमा बनके तुम जलते रहो......


द्वारा,
अनुपम'अनमय'
   




दर्द दिल की शायरी अब हो गयी हम क्या करें.....

बैठे बैठे एक कहानी लिख गयी हम क्या करे,
दर्द दिल का शायरी अब बन गयी हम क्या करे....

हमने रोका खुद को दिल के खेल से हर पल मगर,
उनकी एक आवाज पे दिल खो गया हम क्या करे..

हम जानते थे  प्यार की ये राह है काटों भरी,
प्यार का इस दिल में काटा चुभ गया हम क्या करे..

इस कदर आदत लगी है उनसे पल पल मिलने की,
उनके बिना अब बोझ्ह सी है जिंदगी हम क्या करे...

मौसमे बरसात में दिल इस कदर पागल  हुआ,
हम भीगे उनकी यादो की बरसात में हम क्या करे...

उनतक पहुचने में कई थे मौत के पहरे खड़े,
पर उनकी एक आवाज पे हम चल दिए हम क्या करे....


द्वारा लिखित ,
अनुपम'अनमय'




सुनामी:- डूबते शहर का शहर कभी पहले नहीं देखा.....

सुनामी  और भूकंप की वजह से जापान को जो आर्थिक छति पहुंची है उसका अंदाजा शायद लगा पाना आसान हो मगर जिस पर्यावरण जनित  अस्थिरिता के दौर से वो और वहा  के नागरिक गुजर रहे है उसका अंदाजा लगा पाना और उसके दर्द को समझ  पाना शायद  किसी  के बस की बात नहीं है. वो सिर्फ वही महसूस कर सकता है जो उस दर्द से गुजर रहा है, फिर भी उनके दर्द और वहा के हालात को अपने शब्दों  में बयां  करने की कोशिश कर रहा हू उम्मीद है पसंद आएगी और अगर  पसंद आये तो अपने  विचारो  को जरुर भेजे ...........

 इन आँखों ने ये मंजर कभी पहले नहीं देखा,
डूबते शहर का शहर कभी पहले नहीं देखा...

जिन लहरों से जिंदगी थी वही मौत बन गयी,
इक पल में ही कई जिंदगी बेमौत मर गयी,
आशियाँ खंडहर बनते कभी पहले नहीं देखा,
डूबते शहर का शहर कभी पहले नहीं देखा...

पड़ी है चोटिल घायल कई मासूम जिंदगी,
हुई है अपनों के साये से महरूम जिंदगी,
चीखता रोता ये बचपन कभी पहले नहीं देखा,
डूबते शहर का शहर कभी पहले नहीं देखा....

कोई घायल कोई भूखा कोई लाचार है बैठा,
कोई इस मौत की आंधी में सबकुछ हार है बैठा,
ऐसी बेबसी ऐसा  दर्द कभी पहले नहीं देखा ,
डूबते शहर का शहर कभी पहले नहीं देखा.......

किसी का घर बिखर गया कोई घर से बिछड़ गया,
कुछ को धरती निगल गयी कुछ को सागर निगल गए,
हर तरफ मौत का मंजर कभी पहले नहीं देखा,
डूबते शहर का शहर कभी पहले नहीं देखा......

कभी आबाद ये शहर था बड़ी खुशहाल जिंदगी थी,
हर तरफ बिखरी हुई थी लाशें दो चार जिंदगी थी,
इतनी लाशो भरा शहर कभी पहले नहीं देखा ,
डूबते शहर का शहर कभी पहले नहीं देखा.......

मौत से हर गयी लडती हुई हजारो जिंदगी,
अपने सामने अपनों की ख़तम होती जिंदगी,
ऐसा कहर क़ुदरत का कभी पहले नहीं देखा,
डूबते शहर का शहर कभी पहले नहीं देखा......


द्वारा लिखित,
अनुपम'अनमय'  

बुधवार, 23 मार्च 2011

कैसे कैसे मोड़ पर लाती हमे है जिंदगी.....

कैसे कैसे मोड़ पे लाती हमे है जिंदगी,
दो पल हंसाकर फिर रुलाती हमे है जिंदगी,

कभी सपने दिखाती है हमे पर्वतो से भी बड़े,
कभी गहरे अँधेरे में गिराती  हमे है जिंदगी..

देखना आँखों से न चाहो बुरा फिर भी मगर,
कई बुरे मंजर यहाँ दिखाती हमे है जिंदगी...

चाह कर कोई जहर की घूंट तो पिता नहीं,
पर समंदर विष भरा पिलाती हमे है जिंदगी..
जीना है तो सिख लो पाना यहाँ खोना यहाँ,
अक्सर ही ऐसे मोड़े पे लाती हमे है जिंदगी..
दुःख भरे कुछ सुख भरे अंदाज में ये हर कदम,
नित नयी सुर सरगमे सुनाती हमे है जिंदगी...
फिर भी जीते है आस में उम्मीद में कल की सभी,
कभी छीन ली तो  देती भी  खुसिया हमे है जिंदगी..

गर ये जिंदगी एक राह है काटों भरी फूलो भरी,
हर जख्म पे मरहम भी तो देती हमे है जिंदगी....



द्वारा,
अनुपम "अनमय" 





 
 

मंगलवार, 22 मार्च 2011

अजनबी बनके मिलोगे तो अजनबी बन के मिलेंगे.......

बदल गए तुम इस बात का हम सिकवा न करेंगे,
अजनबी बनके मिलोगे तो अजनबी बनके मिलेंगे..

लाख रुसवा किया है तुमने फिर भी यकीं रखना,
प्यार से बात करोगे तो प्यार से बात करेंगे...

हम बैठे है उसी वक़्त के इंतिजार में अब तक,
की जब मुलाकात करोगे तो मुलाकात करेंगे..

खामोस हम तो रहेंगे तेरी बेवफाई पे य़ू ही,
जब सवालात  करोगे तो सवालात  करेंगे..

अभी ये अंत नहीं है मेरी वफ़ा का हमदम ,
आगाज तुमने लिखा था हम अंजाम लिखेंगे..

चले गए है बहुत दूर तेरे शहर से हम तो,
तुम बुला न सकोगे हम भी आ न सकेंगे..

द्वारा,
अनुपम सिंह"अनमय"   
 

सोमवार, 14 मार्च 2011

फिर अपनों की याद आई......

दिन में हम मिलते रहते हैं दुनिया भर के लोगो से,
रात ढली हम तनहा हुए तो फिर अपनों की याद आई...

रहते है सबके बीच में तो हम कुछ पल खुश हो लेते है,
अब हमको रुलाने फिर से देखो दिन ढल के ये शाम आई...

हम बैठे हुए थे महफिल में और बातो में  बाते  निकल गयी,
और यारो की जब बात चली तब बातो में उनकी बात आई....

उन्हें दिन में फुर्सत मिलती नहीं अपनों को अपना कहने की,
वो प्यार भरी जब बात किये हम तब जाने की रात आई....

जब  ये रात हुई खामोश तो दिल बेचैन हुआ उनकी खातिर,
फिर उनकी जब आवाज सुनी तब सांसों में मेरे साँस आई...

मौसम कैसा है दुनिया का हमको इसकी खबर नहीं,
वो जब जब घर में होते है तब बिन मौसम बरसात आई..

unke भी hoth hile na aur hum भी बस खामोस रहे,
par dil ne dil ki sun li sada aur dhadakan में raftar आई..

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

उम्र के आधे पड़ाव पे ये समझ आया है......

इन्सान जिंदगी में हर एक चीज से कुछ न कुछ सीखता है, कुछ घटनाएँ जो उसके साथ होती है उनसे सीखता है और कुछ औरों के साथ होता हुआ देखकर सीखता है ,शर्त बस एक है की वो सिखाना चाहता हो..देखना और देख कर सीखना दोनों ही बेहद अलग पहलू है. आज  का इन्सान सिर्फ देखता है सीखता नहीं है.. कुछ ऐसे ही मेरी इन पंक्तियों ने कहने की कोशिस की है उम्मीद है ये तो समझ आएगी................

 उम्र के आधे पड़ाव पे ये समझ आया है ,
इन्सान इंसानियत से दूर निकल आया है.......

क्या अपनों की क्या गैरो की हम बात करें, 
वो देर करते नहीं कहने में की ये पराया है....
गर हम झुके तो सर और झुका देते है लोग,
वक़्त ने हमको बड़ी फुरसत से ये दिखाया है....
इतने पथरीले रास्तो से मेरी गुजरी है जिंदगी,
की हर एक ठोकर ने नए इन्सान से मिलाया है...

लुटा दो किसी के वास्ते अगर  अपना सबकुछ,
उसी ने अक्सर ही हमे बड़ी देर तक रुलाया है.....

हमने भी हंस हंस कर हर गम को जगह दी है,
और गम ने भी मेरा साथ ता जिंदगी निभाया है.....

ये दुःख दर्द चलकर क्या पास मेरे आयेंगे,
हमने इनकी बस्ती में ही अपना घर बनाया है........

द्वारा लिखित,
अनुपम"अनमय"
 







शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

कुछ बातें याद रखना.....

 है आखिरी ये शाम तो ये शाम याद रखना,
अपनी यारी की दो चार दिन की याद साथ रखना..

हर लम्हा कोई खुश रहे ये है नहीं मुमकिन,
गम में भी यारो जीने का जज्बात साथ रखना..  

गर मेरी वजह से कभी निकले हो तेरे आंसू तो ,
मेरा तुझसे लिपट के रोने की वो शाम याद रखना...
.
ता जिंदगी यूँ तो साथ निभाना नहीं मुमकिन,
गुजरे हुए लम्हों की बस पहचान साथ रखना,

दूरियां कितनी भी हो हम आजायेंगे तुमसे मिलने,
बस आवाज में बुलाने का वो अंदाज साथ रखना...

भूल जाना मुझको पर एक आरजू है मेरी,
मेरे प्यार का वो पहला पैगाम याद रखना...

थे मिलके जो हासिल किये हमने कई मुकाम,
वो पल सही न सही वो मुकाम याद रखना...
मर के भी हर ख्वाहिस तेरी पूरी किया करेंगे,
हमने जो दी थी तुमको ये जुबान याद रखना.....

द्वारा लिखित,
अनुपम"अनमय"

कुछ बातें अधूरी है.....

कुछ जज्बात अधूरे है कुछ बाते अधूरी है,
बिना उस चाँद के मेरी रातें अधूरी है....

दिल से दिए हो काटें तो फूल से लगते है,
जो दिल से नहीं दिए तो सौगातें अधूरी है..

महबूब अगर  हो तो पतझड़  भी सावन है,
बिना महबूब के सावन की बरसातें  अधूरी है,

ना कहा सको अगर दिल की बात जिससे चाहो,
तो सौ बार मिलके भी वो मुलाकातें  अधूरी है....

द्वारा लिखित,
अनुपम "वास्तव"





बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

मेरी वफ़ा यूँ ही बदनाम होनी थी......

जिंदगी लगता है जैसे वीरान होनी थी,
मेरी वफ़ा यूँ ही बदनाम होनी थी...

कोई शिकवा नहीं मुझे मेरी बदनामी का,
ये एक दिन यूँ ही सरेआम होनी थी..

वफ़ा के नाम पर मेरी कोशिशे एक दिन,
बेवफा होकर यूँ ही नाकाम होनी थी...

चलते चलते संग क्या पता था क्या होगा,
की मै तनहा और राहें यूँ ही सुनसान होनी थी..

क्या किस्मत की रिश्ते क्या से क्या हो गए,
अब मुलाकात भी बनके अन्जान होनी थी....

अपने तो अपने किस्मत ने भी छोड़ा दिया,
मेरी किस्मत किसी और पे मेहरबान होनी थी...

चन्द कदम दूर मंजिल से वक़्त रूठ गया,
हाथ छूटा जब मुहब्बत जवान होनी थी...

द्वारा लिखित ,
अनुपम "वास्तव"

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

हमने देखि है यहाँ बदलती हुई हर वक़्त जिंदगी......

हमने देखी यहाँ बदलती हुई हर वक़्त जिंदगी,
घर में कुछ  और बाहर कुछ और जिंदगी....

यूँ तो सिखा है कई तरह से जीवन का फलसफा,
जब देखा तो दिखाती गयी कुछ और जिंदगी....

इन्सान एक से मिले जहा भी  देखा हर तरफ,
पर महल में कुछ और सड़क पे कुछ और जिंदगी..

कहीं उड़ते हुए देखे है हवा में कीमती कागज,
कहीं उसकी कमी ले लेती है कुछ और जिंदगी....

किसी को रंगीनियों से फुर्सत नहीं कुछ और सोचने को,
कही सोती है भूखे पेट यहाँ कुछ और जिंदगी....

यहाँ लगे हैं दौड़ने में सब कहा जाना खबर नहीं,
कुचल के दौड़ते है सब वही कुछ और जिंदगी....

कहीं पे सड़ रही है धुप में बरसात में मेहनत,
कही पे तोड़ती दम भूख से कुछ और जिंदगी..

हजारो बुत बने है हर तरफ इतिहास बनाने को,
लगाकर दाव पे जीती हुई कुछ और जिंदगी.....

तरफ से ,
अनुपम 'वास्तव"





गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

इशारों ही इशारों में.......

प्यार तो कर लिया हमने इशारो ही इशारो में,
कहा तुमने सुना हमने इशारो ही इशारो में :

खामोश लउब थे अभी तक जो बात कहने में,
हवा ने बात कहा दी वो इशारो ही इशारो में :

नजर के तीर से जालिम की ऐसे हो गए घायल,
की निकला दिल हथेली पे इशारो ही इशारो में:

चन्द कदमो की दुरी पे खड़े थे जाके वो हमसे,
ये धड़कन बढ़ रही थी पर इशारो ही इशारो में:

होठ उनके हिले फिर बात पहुंची दिल में जब मेरे,
तो दिल पागल हुआ मेरा इशारो ही इशारो में :

हम जिस दर्द को होठो से बयां कर नहीं पाए ,
ये लाली आंख की कहा दी इशारो ही इशारो में :

ऐसे खो गए थे हम जरा उनकी निगाहों में ,
ढली ये शाम भी ऐसे इशारो ही इशारो में :

रहेंगे साथ जन्मो तक तेरी बाहों में ऐ हरदम,
ये वादे कर लिए हमने इशारो ही इशारो में:

सुना था जिस नशे की बात हमने इस ज़माने में,
पिला दी वो निगाहों से इशारो ही इशारो में.......

अनुपम "वास्तव"