मेरे सपनो को पल भर में न जाने क्यू जला डाला,
समझ कर बेखबर सबने मेरा ही घर जला डाला...
न जाने क्या बिगाड़ा था यहाँ हमने ज़माने का,
मेरी खुशियों पे ही सबने यहाँ मातम मना डाला.....
कितनी कोसिसे कर ली बया हर दर्द करने की,
सुनी मेरी नहीं अपना ही सबने गम सुना डाला....
कभी गिरते न थे आंसू जहाँ मेरी निगाहों से,
उन्ही आँखों से आंसू खून के सबने बहा डाला....
मेरी आँखों को अश्को से रहे भरते सभी अपने,
जो बरसे हर घडी आँखों को वो सावन बना डाला...
ये परवाना रुका जब न कभी दुनिया के रोके से,
उसी के रंज में सबने शमा को ही बुझा डाला.......
लेखक,
अनुपम"अनमय"
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