गुरुवार, 29 जुलाई 2010

मैं कहूँ ना कहूँ ...........

मैं कहूँ ना कहूँ मेरी गजल मेरी जुबां है,
मैं रहूँ ना रहूँ मेरा हर सच यहाँ बयां हैं.....

कभी सुख कभी दुःख भरी राहों से गुजरती हुई,
मेरी जिंदगी के कारवां की एक छोटी सी दास्ताँ है.....

जो देखा है जो सुना है वही निकला मेरी कलम से,
अभी लिखने बहुत से सच है जो बिखरे यहाँ वहां है....

मैं दोष किसको देता अपनी किस्मत की मुफलिसी का,
जब मेरा रब ही रूठ करके ना जाने किधर कहाँ है......

समय का चक्र घुमाता रहा कैसे कैसे मेरी किस्मत,
मिली हर चोट का सब्दों में झलकते हुयें निशा हैं.....

गज़ल कहती है जिंदगी को बड़े नजदीक से देखा है,
किसी में जिंदगी एक बोझ किसी में जिंदगी जवां है....

हर रोज एक नए हालत से जिंदगी ने इस तरह मिलाया,
की धीरे धीरे ढलती गयी जवानी की जो खुमा है.....


अनुपम "वास्तव"

जाम हाथ में लिए परेशानियों का जिक्र होता है.....

 आज कल शाम मे तनहाइयों का जिक्र होता है,
जाम हाथ में लिए परेशानियों का जिक्र होता है...

कोई सुनाता है अपने अपने खुशनुमा लम्हे ,
किसी की बात में दुस्वरियों का जिक्र होता है...

बगल में बैठे दो चार आशिको में यू ही,
अपनी अपनी आशानियों का जिक्र होता है....

अनजाने ही सही उन चुलबुली बातो में ,
जिंदगी की दो चार गहराइयों का जिक्र होता है....

नहीं है होस  में कोई दुनिया ये समझ्हती है ,
पर दौरे अ नशा में ही सचाइयों  का जिक्र होता है....

कुछा दुख भरे कुछा सुखा भरे अंजाम के साथ ,
भूली बिसरी कई कहानियों का जिक्र होता है....

लड़खड़ाते है कदम महफिल से उठने के बाद,
फिर भी तेज रफ़्तार सवारियों का जिक्र होता है....

दिल से जो न निकले थे दर्दे गम होष में ,
अब मदहोशी में उन रुसवाइयों का जिक्र होता है....

अनुपम "वास्तव"