दिन में हम मिलते रहते हैं दुनिया भर के लोगो से,
रात ढली हम तनहा हुए तो फिर अपनों की याद आई...
रहते है सबके बीच में तो हम कुछ पल खुश हो लेते है,
अब हमको रुलाने फिर से देखो दिन ढल के ये शाम आई...
हम बैठे हुए थे महफिल में और बातो में बाते निकल गयी,
और यारो की जब बात चली तब बातो में उनकी बात आई....
उन्हें दिन में फुर्सत मिलती नहीं अपनों को अपना कहने की,
वो प्यार भरी जब बात किये हम तब जाने की रात आई....
जब ये रात हुई खामोश तो दिल बेचैन हुआ उनकी खातिर,
फिर उनकी जब आवाज सुनी तब सांसों में मेरे साँस आई...
जब ये रात हुई खामोश तो दिल बेचैन हुआ उनकी खातिर,
फिर उनकी जब आवाज सुनी तब सांसों में मेरे साँस आई...
मौसम कैसा है दुनिया का हमको इसकी खबर नहीं,
वो जब जब घर में होते है तब बिन मौसम बरसात आई..
unke भी hoth hile na aur hum भी बस खामोस रहे,
par dil ne dil ki sun li sada aur dhadakan में raftar आई..
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